गेंदबाज नहीं गेंदबाजी में परिवर्तन करना होगा

ishant-b-04-06-13धोनी की सेना एक बार फिर अपने गेंदबाजों के हाथों विफल हो गई। भारत के पिछले दो साल के रेकॉर्ड को देखें तो अमूमन हर मैच में जीत उसे बल्लेबाजों ने दिलाई है। और इसका विपरीत असर भारत के गेंदबाजी विभाग में साफ दिखाई दे रहा है।

उनका मनोबल बॉउन्ड्री के दूसरी तरफ ही रहने लगा है। जब भी कोई टीम भारत के दौरे पर आती है तो भारतीय बोर्ड ऐसी पिच का निर्माण कराते हैं जिसमें तेज गेंदबाजों को कुछ भी हासिल न हो ताकि मैच की पूरी जवबादेही बल्लेबाजों पर हों। और ऐसे में भारतीय टीम को हार ही मिलती है। इंग्लैंड का भारत दौरा हो या फिर एकदिवसीय श्रृंखला के लिए ऑस्ट्रेलिया का। भारतीय टीम नहीं चाहती कि पिच तेज गेंदबाजों को सहयोग करे और टीम की इस सोच का विपरीत असर भारत के गेंदबाजों पर दिखाई देने लगता है।
भारतीय टीम में तेज गेंदबाजी की कमान भूवनेश्वर कुमार , विनय कुमार और ईशांत शर्मा के ऊपर है। अब इनकी शैली देखिए, उत्तर प्रदेश के भूवनेश्वर कुमार की खासियत गेंद को दोनों तरफ स्विंग कराने में है, इसकी तुलना में पिच का मिजाज ऐसा रखा गया है जहां भूवनेश्वर चाह कर भी गेंद को घुमा नहीं पाते हैं क्योंकि पिच पर घास नहीं है। भारतीय टीम को डर है कि अगर पिच पर घास रखा जाए तो कंगारू गेंदबाज भारतीय बल्लेबाजों की पोल खोल कर रख देंगे। ऊपर से भूवनेश्वर कुमार की गेंद 130 किमी की रफ्तार शायद ही पकड़ पाती है। जब विकेट पर घास न हो, नमी न हो भूवनेश्वर कुमार कोई काम के नहीं क्योंकि पुरानी गेंद उन्हें रास नहीं आती। ऐसे में ये सवाल जायज नहीं कि जानबुझकर भारतीय क्रिकेट बोर्ड एक और इरफान पठान पैदा करने में लगी है?
अब बात पिछले मैच में ऑस्ट्रेलिया के लिए किसी हिरो से कम नहीं रहे दिल्ली के तेज गेंदबाज ईशांत शर्मा की। ईशांत शर्मा जब टीम में आए थे तब उनके पास रफ्तार थी जो न जाने कहां खो गई है और तेज गेंदबाजी बस रनअप में ही दिखती है। उनके गेंद से किसी भी देश के बल्लेबाजों को कोई दिक्कत नहीं आती, क्योंकि जहां पिच पर उछाल न हो वहां ईशांत एक नौसिखए की तरह गेंद एक ही लाईन और लेंथ पर फेंकते नजर आते हैं। पूछ्ल्ले बल्लेबाज को लगातार ऑफ कटर फेंकते हैं जबकि उस बल्लेबाज के पास एक ही शॉट रहता है वो भी मिड विकेट पर। और हुआ भी वही चाहे फॉकनर हो या मैकेय उन्हें ऑन साइड पर ही खेल रहे थे। काबिले तारिफ है कि गेंद भी ईशांत लेग और मिडिल स्टाम्प पर ही फेंक रहे थे…
आखिरी के ओवरों में तेज गेंदबाजों का प्रमुख अस्त्र यॉर्कर होता है और अगर उसमें रिर्वस स्विंग मिल जाए तो सोने पर सुहागा। आईसीसी के नए नियम से वनडे क्रिकेट में रिवर्स स्विंग अब कम ही देखने को मिलती है लेकिन यॉर्कर तो फेंक ही सकते हैं। भारतीय गेंदबाजों के तरकश से यॉर्कर वैसे ही गुम हो गई जैसे भारतीय पिच से हरी घास।
कर्नाटक के विनय कुमार को टीम में आने का मौका आईपीएल से मिला जहां एक गेंदबाज चार ओवर ही फेंक सकता है। अब अगर उनके ओवर को गौर से देखें तो पाएंगे कि विनय कुमार शुरूआती चार ओवर तक ही अच्छी गेंदबाजी कर पाते हैं जैसे कि उन्हें इसकी आदत सी हो गई हो। गेंद में रफ्तार अपनी जान से ज्यादा देने की कोशिश करते हैं और वहीं इनसे गलती हो जाती है। इनके तरकश में एक ही गेंद है वो भी मलिंगा स्टाईल वाली राउन्ड आर्म एक्शन जब इसके जनक मलिंगा कारगर साबित नहीं हुए तो कॉपी करने वाला कैसे हो सकता है।
भारत तीन तेज गेंदबाज लेकर उतरता है जिसमें एक भी खब्बू नहीं। शायद भारत अभी भी ऑस्ट्रेलिया के लैंगर, हैडेन, गिलक्रिस्ट, हसी काल में जी कर टीम में गेंदबाज भर्ती कर रहे हों। जबकि अभी के टीम ऑस्ट्रेलिया में दाहिने हाथ के बल्लेबाज भड़े परे हैं। फिर भी जयदेव उनादकट को सिर्फ पानी की बोतल ढोने के काम में रखा गया है। हो सकता है कि अगले मैच में उन्हें ईशांत की जगह टीम में दिख भी रखा जाए। लेकिन अब वो भी असरदार साबित नहीं होने वाले क्योंकि उन्हें पुरानी गेंद से गेंदबाजी करने को मिलेगी। और दूसरी तरफ इस टीम के सभी गेंदबाजों का आत्मविश्वास अपने मालिक को ढूंढनें में लगा है।
मैदान पर गेंदबाजी हमेशा साझेदारी में होती है इसके लिए दोनों छोर अहम हैं। जबतक दोनों छोर से बल्लेबाजों पर दबाव नहीं होगा तब तक विकेट के लिए विपक्षी बल्लेबाजों के गलती का ही आश्रय लेना होगा।
बीसीसीआई जल्द तेज गेंदबाजी पैदा करने वाले संस्थान पर पैसा खर्च करे नहीं तो आने वाले समय में बीसीसीआई की कमाई भी बॉउन्ड्री के पार ही होगी क्योंकि हर दिन 300 के पार लक्ष्य नहीं सधते।

शशांक शेखर

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