निंदक नियरे राखिये

“निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय,
बिन साबुन पानी बिना निर्मल करे सुभाय”
कबीर की यह वाणी भारत के वर्तमान राजनीतिक स्थिति को आईना दिखाती है। ताजा हालात में जिस तरह कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी के ऊपर राष्ट्रदोह का आरोप लगाया गया है वह बयां करती है कि कैसे राजनेता अपने ऊपर होने वाले व्यंगात्मक प्रतिक्रया से घबरा हुए हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें जनता किसी भी रुप से अपने चुने हुए लोगों को उनके द्वारा प्रतिपादित किये जा रहे कामों की व्याख्या कर सच्चाई से अवगत करा सके। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह आधार बिलकुल नहीं है कि बातें हमेशा देश के लिए सकरात्मक रुप से ही रखी जाए। कभी-कभी देश की स्थिति को बयां करने के लिए नकारात्मक रुप भी अपनाना पड़ता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि कोई क्यों नकरात्मक रुप को अपनाता है..गांधीजी ने कहा था कि देश के एक भी नागरिक के आंखों में आंसू आते हैं तो यह देश के सत्तापक्ष के लिए सोचने की बात है और उन्हें आगे बढ़ कर आंसू को पोछना चाहिए। लेकिन आज की स्थिति ठीक उलटती जा रही है अगर कोई दुखी होकर सरकार के खिलाफ कुछ बोलता हे तो पूरा सरकारी तंत्र उसके खिलाफ लग जाता है। इसके प्रतिक्रिया स्वरुप कोई ऐसी बातें कर जाता है जो सरकार के मन मस्तिष्क में एक जबरदस्त आघात पहुंचाती है और सरकार उस पर राष्टद्रोही होने का बिल्ला चिपका देती है।
सरकार को तो यह देखना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति सरकार के कामों से इतना भी दुखी न हो जाए कि उसे सरकार के विपरित जाना पड़े। राजनेता अगर इस पर मंथन करें और सिर्फ ये सोचें की देश की जनता का कल्याण कैसे होगा , देश से गरीबी, भूखमरी कैसे दूर होगी, देश से बोरोजगारी कैसे हटेगी, भारत विकासशील देश से विकसित राष्ट्र कैसे बनेगा तो शायद किसी असीम त्रिवेदी को किसी का कार्टून बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

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